अंतरराष्ट्रीय संगीत दिवस पर गायक बनने की चाह रखने वाले युवाओं को साधु तिवारी व ऋषि पाठक का गुरुमंत्र

दिल से निकला संगीत ही दिलों तक पहुंचता है भक्ति, भावना और संगीत का अनूठा संगम है ‘हनुमान अंश’: साधु तिवारी व ऋषि पाठक

संगीत की धुनों में गूंजती भक्ति और ‘हनुमान अंश’ की कहानी

जतिन /राजा (मुम्बई )। एक अक्टूबर अंतरराष्ट्रीय संगीत दिवस पर संगीत की उस शक्ति को सलाम, जो भावनाओं को शब्दों से कहीं आगे पहुंचाती है। इन दिनों फिल्म ‘हनुमान अंश’ के गीत देश में लोकप्रियता बटोरने के साथ वैश्विक संगीत जगत में भी अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे हैं। फिल्म के गीतों ने रिलीज के बाद लगातार सुर्खियां बटोरी हैं और भक्ति, आस्था व संगीत के अनूठे संगम के कारण श्रोताओं का ध्यान आकर्षित किया है। फिल्म के बहुचर्चित गायक साधु तिवारी और ऋषि पाठक ने अपनी आवाज के जरिए इन भावनाओं को दर्शकों तक पहुंचाया है। अंतरराष्ट्रीय संगीत दिवस पर दोनों गायकों से उनकी संगीत यात्रा, ‘हनुमान अंश’ से जुड़े अनुभवों और संगीत के युवा पीढ़ी पर प्रभाव को लेकर हमारे संवाददाता जतिन जर्नलिस्ट ने खास बातचीत की।

ऋषि पाठक से बातचीत

जतिन: अंतरराष्ट्रीय संगीत दिवस पर सबसे पहला सवाल—आपके लिए संगीत की असली ताकत क्या है? क्या वह मनोरंजन करता है, भावनाएं व्यक्त करता है या इंसान को भीतर से बदलने की क्षमता भी रखता है?ऋषि पाठक: मेरे लिए संगीत ये तीनों काम करता है। ‘म्यूज़’ यानी जो आपको मंत्रमुग्ध कर दे, आपके भीतर जादू पैदा करे और उसी से ‘म्यूज़िक’ शब्द आया है। संगीत बहुत मुक्त प्रवाह वाला है। वह हमेशा कुछ न कुछ देता है, लेकिन उससे हम क्या लेते हैं, यह हमारी मनोदशा और व्यक्तित्व पर निर्भर करता है।

जतिन: ‘हनुमान अंश’ के आपके संगीत में कौन-सा गीत आपके दिल के सबसे करीब है और उसकी रचना से जुड़ा कोई खास अनुभव हमारे पाठकों से साझा करना चाहेंगे?

ऋषि पाठक: ‘ राम भजन की ओर’ मेरे लिए बेहद खास गीत है। इस गीत पर विचार करते समय मेरे मन में श्रीराम प्रभु का वह चरित्र आया, जब रावण पर विजय के बाद भी उन्होंने सोने की लंका अपने पास नहीं रखी, बल्कि उसे विभीषण को सौंपकर अयोध्या लौट गए। उनका यह त्याग और मर्यादा मुझे हमेशा प्रभावित करती रही है। मैं फिल्म की लेखन प्रक्रिया में अपने गुरु डॉ. विशाल चतुर्वेदी जी के साथ सह-लेखक के रूप में भी जुड़ा था। इसी दौरान विचार आया कि जहां राम का भजन होता है, वहां हनुमान जी स्वयं चले आते हैं। फिल्म का विषय भी हनुमान जी से जुड़ा था, इसलिए ये भाव आपस में जुड़ते गए और गीत आकार लेता गया। मैंने यह गीत गुरुजी को सात बार सुनाया और उन्हें यह इतना पसंद आया कि ‘राम भजन की ओर’ सबकी जुबान पर चढ़ गया।

जतिन: क्या आपने सोचा था कि ‘हनुमान अंश’ के गीत दुनिया भर में इतने चर्चित होंगे?

ऋषि पाठक: सच कहूं तो उस समय हमारा पूरा ध्यान संगीत को सच्चे भाव और भक्ति के साथ प्रस्तुत करने पर था। हमने कभी नहीं सोचा था कि ये गीत इतनी दूर तक पहुंचेंगे। आज श्रोताओं का प्यार और आशीर्वाद हमारे लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है। यह सब बाबा नीम करोली जी का आशीर्वाद और चमत्कार है। मेरे संगीत ‘राम भजन’ की और में गायिका निवेदिता पद्मनाभन, गायक श्रेयस धर्माधिकारी, संगीत निर्माण एवं संयोजन में धीरेंद्र मुलकलवार और पूरी टीम ने जिस श्रद्धा और मेहनत से योगदान दिया, वे सभी इस सफलता का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

साधु तिवारी से बातचीत

जतिन: ‘हनुमान अंश’ के गीतों की लोकप्रियता भारत के साथ दुनिया भर में पहुंच रही है। आपको इसकी सबसे बड़ी वजह क्या लगती है?

साधु तिवारी: इसका सबसे बड़ा कारण आत्मिक जुड़ाव है। हमारा संगीत सरल और दिल से जुड़ा हुआ है, इसलिए भाषा और सीमाओं से परे दुनियाभर के लोग इससे जुड़ रहे हैं। कई बार हमें भी दूसरे देशों के गाने पसंद आते हैं, क्योंकि संगीत सीधे आत्मा से जुड़ता है।

जतिन: ‘हनुमान अंश’ का आपका लिखा, संगीतबद्ध और गाया गीत ‘जब जिद पर आ गईं पार्वती’ इन दिनों सबसे अधिक लोकप्रिय है। इस गीत की रचना के पीछे की कहानी क्या है?

साधु तिवारी: इस गीत की शुरुआत निर्देशक डॉ विशाल चतुर्वेदी की बताई परिस्थिति से हुई, क्योंकि यह बाबा नीम करोली जी की शादी के प्रसंग पर फिल्माया गया है। फिल्म में बुंदेलखंडी भाषा का इस्तेमाल पहले से था, इसलिए हमने गीत में भी उसका स्पर्श देने की कोशिश की। मैं खुद ग्वालियर से हूं, इसलिए उस भाषा और मिट्टी से मेरा जुड़ाव है। हमने गीत में मिट्टी की खुशबू, बुंदेलखंडी रंग और भोलेनाथ व माता पार्वती की भक्ति का संगम रखा। गीत उस प्रसंग में इतना सहज बैठ गया कि दर्शकों ने भी इसे खूब पसंद किया।

जतिन: अंतरराष्ट्रीय संगीत दिवस पर संगीत में करियर बनाने वाले युवाओं को आपका क्या संदेश है?

साधु तिवारी: मेरा संदेश है कि संगीत दिल और आत्मा से जुड़ा होना चाहिए। जब आपकी धुन आपकी आत्मा से जुड़ेगी, तभी वह दुनिया की आत्मा और दिल तक पहुंचेगी। इसलिए सच्चे भाव से संगीत करें और अपनी कला को निखारने के लिए लगातार अभ्यास करते रहें।

जतिन: आज की युवा पीढ़ी भक्ति गीतों पर रील और वीडियो बना रही है। संगीत के इस बदलाव को आप किस तरह देखते हैं?

साधु तिवारी: मैं इसे बेहद सकारात्मक बदलाव मानता हूं।मुझे बेहद खुशी है कि युवा पीढ़ी ही नहीं, बच्चे और बुजुर्ग भी भावपूर्ण संगीत से जुड़ रहे हैं। मेरी इच्छा है कि यह जुड़ाव हमेशा बना रहे।

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